Thursday, 7 September 2017

दोस्त

वक़्त है मेरा और घड़ी तेरे हाथ
खुली किताब मेरी और फिर आया एक शाम

जब जिक्र आया तेरा , हसरतें हुई गुलाम
एक सोच लेके तेरी पन्नों को मरहम बनाया फिर से आज

खुद को पतंग किया तेरी ख्वाइशों की डोर में
वो दिन पुराने हो गए नई यादों के साथ

- राहुल श्रीवास्तव

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