वक़्त है मेरा और घड़ी तेरे हाथ
खुली किताब मेरी और फिर आया एक शाम
जब जिक्र आया तेरा , हसरतें हुई गुलाम
एक सोच लेके तेरी पन्नों को मरहम बनाया फिर से आज
खुद को पतंग किया तेरी ख्वाइशों की डोर में
वो दिन पुराने हो गए नई यादों के साथ
- राहुल श्रीवास्तव
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